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हरिद्वार की फार्मा कंपनियों के सैंपल फेल, औषधि विभाग की निगरानी पर सवाल…

हरिद्वार। हरिद्वार जिले में दवा बनाने वाली कई फार्मा कंपनियों के सैंपल फेल होने का मामला दवाओं की गुणवत्ता और औषधि विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। बताया जा रहा है कि जांच में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन, रैबेप्राजोल टैबलेट, खांसी का सिरप और लॉराज़ेपम टैबलेट के नमूने भी मानकों पर खरे नहीं उतरे। भगवानपुर, रुड़की और सिडकुल के औद्योगिक क्षेत्रों में दवा निर्माण से जुड़ी कंपनियों को लेकर यह मामला चर्चा में है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दवाओं की गुणवत्ता जांचने के लिए विभाग कितना गंभीर है और हर महीने सामने आने वाली खामियों पर कितनी कार्रवाई होती है?
दवाएं सीधे लोगों की सेहत से जुड़ी होती हैं। ऐसे में दवाओं के नमूने फेल होने की खबर को गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन, रैबेप्राजोल टैबलेट, खांसी के सिरप और लॉराज़ेपम टैबलेट जैसे अलग-अलग प्रकार के उत्पादों के नमूनों की जांच में कमी सामने आने पर संबंधित दवा और उसकी जांच रिपोर्ट के आधार पर उचित कदम उठाना जरूरी है। हालांकि, किसी दवा का सैंपल फेल होने का कारण जांच रिपोर्ट से ही स्पष्ट होता है। केवल नमूना फेल होने की जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दवा से किसी मरीज को नुकसान पहुंचा है।
हर महीने की खामियों पर कार्रवाई कितनी?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल औषधि विभाग की कार्रवाई को लेकर है। विभाग हर महीने कितनी दवाओं के नमूने लेता है? कितने नमूने जांच में फेल होते हैं? संबंधित कंपनियों को कितने नोटिस जारी किए जाते हैं और कितने मामलों में लाइसेंस या बिक्री को लेकर कार्रवाई की जाती है? इन सवालों के जवाब सामने आने जरूरी हैं।
भगवानपुर, रुड़की और सिडकुल जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में दवा निर्माण इकाइयों की नियमित जांच, उत्पादन प्रक्रिया की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था की पड़ताल बेहद जरूरी है। यदि किसी दवा का नमूना मानकों के अनुरूप नहीं पाया जाता है, तो संबंधित बैच के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई, जरूरत पड़ने पर बिक्री पर रोक और बाजार से दवा वापस मंगाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का ब्योरा सार्वजनिक हो
औषधि विभाग को दवाओं के नमूनों की जांच और कार्रवाई से संबंधित जानकारी पारदर्शी तरीके से सामने रखनी चाहिए। इससे पता चल सकेगा कि नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के खिलाफ वास्तव में कितनी सख्ती बरती जा रही है। साथ ही, जिन दवाओं के नमूने फेल बताए जा रहे हैं, उनकी कंपनी, बैच नंबर, जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई की पुष्टि भी जरूरी है।
अब सवाल यह है कि दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार विभाग अपनी निगरानी व्यवस्था को कितना मजबूत करता है और हर महीने सामने आने वाली कमियों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है। इस संबंध में औषधि विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

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